स्वार्थ
और अहंकार से मुक्त होकर औरों के लिए जो कष्ट उठाया जाता है , वही सच्चा
धर्म है। धर्म है औरों के लिए , राष्ट्र के लिए , विश्व के लिए स्वयं का
उत्सर्ग। परहित अर्थात औरों की ख़ुशी के लिए, औरों की पीड़ा मिटाने के
लिए स्वयं को उत्सर्ग कर देना ही धर्म है। यह प्रक्रिया अत्यंत कष्टदायी
अवश्य है, परन्तु इसी में सुख, शांति एवं संतोष मिलता है। ऐसे में धर्म
कष्टों अथवा संकटों से घिरा अवश्य होता है , धर्म के पालन से कठिनाई अवश्य
होती है, परन्तु अंततः धर्म की ही जीत होती है और धर्मपालन का परिणाम,
अत्यंत श्रेष्ठ एवं संतोषदायक होता है।
औरों को क्लेश देना अधर्म है
और परहित हेतु क्लेश सहना धर्म है। समर्थ और शक्तिशाली व्यक्ति दूसरों को
कष्ट दे सकता है और कष्ट देने में उसे कोई अतिरिक्त चेष्टा भी नहीं करनी
पड़ती। सबल निर्बल को सता सकता है और सताता भी है। अपनी सामर्थ्य और सम्पदा
का उपयोग और उपभोग तो सभी करते हैं । अपने सुख को प्राथमिकता देना सामान्य
बात हो सकती है। स्वयं के लिए तो सभी जीते हैं, परन्तु ये सभी मानदंड और
मापदंड, ईश्वर के श्रेष्ठ राजकुमार इंसान के लिए सही ठहराए नहीं जा सकते
हैं। ऐसी प्रकृति और प्रवृति तो मानवेतर प्राणियों में भी पायी जाती है,
फिर मानव और मानवेतर प्राणियों में अंतर क्या है, फरक क्या है ?
यह
अंतर धर्म ही है, जो मनुष्य को अन्य योनियों से अलग खड़ा करता है, विशिष्ट
और विशेष बनाता है और इसे प्रकृति का सर्वोत्तम एवं श्रेष्ठ प्राणी बनाने
में विशिष्ट भूमिका अदा करता है। धर्म उस साहस का नाम है, जो यह प्रतिपादित
कर सके कि कैसी भी विपन्न एवं विपरीत परिस्थितियाँ आएँ , कैसा भी कष्ट
मिले और किसी भी तरह की कठिनाइयों का क्यों न सामना करना पड़े , हम सही व
शाश्वत पथ का सदा अनुसरण करेंगे।
धर्म होगा तो साहस होगा और साहस
होगा तो प्रस्तुत चुनौतियों से डटकर मुकाबला होगा , प्राणपण से उनका सामना
किया जायेगा। साहस होगा तो इस धर्म से कभी भी कदम वापस नहीं खींचे जा
सकेंगे, चाहे इसके लिए कितनी भी और कैसी भी कीमत क्यों न चुकानी पड़े।
जो
डरपोक होते हैं , कायर होते हैं , पल-पल घबरा उठते हैं , वे कभी भी धर्म
के साथ खड़े नही हो सकते। ऐसे लोगों पर जब भी विपरीत परिस्थितियाँ आती हैं
और जरा-सी भी कठिनाइयाँ सिर उठाती हैं तो ये सिहर उठते हैं, स्वयं को
बचाने के लिये ये भागते फिरते हैं। ये धार्मिक नहीं हो सकते, चाहे बाहरी
रूपों में कितने भी धर्मावलम्बी क्यों न दिखते हों। धर्म के प्रतीकों को
केवल दिखाने के लिये ओढ़कर कोई धार्मिक तो दिख सकता है , परन्तु धार्मिक हो
नहीं सकता।
तिलक, गले में कंठी माला, विशेष प्रकार के वस्त्र धारण कर
कोई भी धार्मिक होने का ढोंग तो कर सकता है , पर धार्मिक हो नहीं जाता।
धर्म तो औरों के लिए स्वयं को मिटा देने का नाम है, धर्म का सच्चा प्रतीक
एक दीपक है , जो स्वयं को तिल -तिल जलाकर अंत तक प्रकाश की किरणें बिखेरता
है। वह स्वयं जल जाता है, लेकिन इस जलन से उफ तक नहीं करता है, बल्कि
मुस्कुराते हुए, ज्योति बिखरते हुए स्वयं को उत्सर्ग कर देता है। धर्म औरों
की पीड़ा के निवारण के लिए स्वयं को उत्सर्ग करने का नाम है।
कष्ट
तो जीवन का पर्याय है। जब जीवन है तो कष्ट होगा ही। परन्तु ऐसा कष्ट जो
किसी और के लिए सहा जाता है, स्वयं के सभी संसाधनों एवं साधनों को लुटाकर
सहर्ष कठिनाइयों को ओढ़ लेना ही सच्चा धर्म है। महान सम्राट शिबि ने एक
दुर्बल एवं निरीह जीव को बचाने के लिए अपने हाथों खडग से अपने जाँघ का मांस
काटकर अपार पीड़ा सही। वे चाहते तो स्वयं के बदले अन्य किसी को बलिदान देने
को कह सकते थे, परन्तु उन्होंने ऐसा नहीं किया और सहर्ष उस कष्ट को सह गए।
उनके द्वारा सही गयी इस पीड़ा ने ही उन्हें सच्चा धार्मिक बता दिया।
उन्होंने अपने कर्म से धर्म को जीवंत कर दिया।
ऋषि
दधीचि महान तपस्वी थे। तपोनिष्ठ जीवन ही उनका सच्चा जीवन था। वे आत्मज्ञ
थे। उन्हें न तो किसी का भय था और न किसी की आवश्यकता। पुराणों में कथा
आती है कि एक बार ऋषि दधीचि भगवान विष्णु से मिलने पहुँचे तो उनका तेजोवलय
इतना विराट एवं प्रभावशाली था कि उसके सम्मुख भगवन विष्णु को भी अपनी
दृष्टि नीची करनी पड़ी। ऐसे महान तपस्वी ऋषि दधीचि से बिना अनुमति एवं बिना
स्वीकृति के उनकी अस्थियों को कोई कैसे प्राप्त कर सकता था? परन्तु सृष्टि
कल्याण हेतु वज्र निर्माण करने के लिए उन्होंने सहर्ष अपनी अस्थियाँ दान दे
दीं। उन्होंने धर्म रक्षा के लिए असहनीय और अपार पीड़ा सहर्ष स्वीकार कर
ली। धर्म ऋषि दधीचि के इस महान त्याग से ही परिभाषित होता है।
सत्यवादन
के प्रतीक राजा हरिश्चंद्र ने भी तो धर्म की रक्षा हेतु कष्टकारी जीवन को
स्वीकार किया था। वे एक पराक्रमी और प्रतापी राजा थे और धर्म रक्षा के
अतिरिक्त अन्य कोई ऐसा कारण न था, जो उन्हें उस स्थिति में लाकर खड़ा करता,
जिसमें उन्हें अपनी पत्नी बच्चो को बेचना पड़े तथा अपने ही पुत्र के शवदाह
के लिए पैसे मॉँगने को विवश होना पड़े। परन्तु धर्म की रक्षा के लिए न केवल
उन्होंने अपना समस्त राज्य ब्रम्हर्षि विश्वामित्र के चरणों में निछावर कर
दिया, वरन ऐसे कष्टो को भी सहर्ष अंगीकार किया, जिन्हें सहना तो दूर उनकी
कल्पना मात्र भी सिहरन पैदा कर देती है। राजा हरिश्चंद्र में भी धर्म नए
कलेवर में जी उठा था।
अपने शास्त्रों में एवं इतिहास के पन्नो पर हम
जिन व्यक्तित्वों को धर्म की जिवंत परिभाषा के रूप में पढ़ते हैं, उन सबके
व्यक्तित्व स्वयं के जीवन को तपा कर एवं दूसरों के कष्टों को मिटाकर तैयार
हुए नजर आते हैं। वस्तुस्थिति में यही धर्म की सच्ची परिभाषा भी है। मात्र
स्वयं के स्वार्थों की पूर्ति के लिए जीने वाले तो मोड़ मोड़ पर मिल जाते
हैं, पर दूसरों के कष्टों को हरने के लिए अपने प्राणों की आहुति लगाने वाले
ही सच्चे धार्मिक होते हैं। सच्चे धर्म की अनुभूति व्यक्तिगत स्वार्थ और
अहंकार से परे जाकर ही होती है।
(उपर्युक्त आलेख अखंड ज्योति - अक्टूबर २०१५ से लिया गया है।)



No comments:
Post a Comment