Sunday, March 22, 2026

५१ कुण्डीय गायत्री महायज्ञ – कन्नौजा (मुरादनगर) में आध्यात्मिक चेतना का ऐतिहासिक जागरण

कन्नौजा, मुरादनगर क्षेत्र में आयोजित ५१ कुण्डीय गायत्री महायज्ञ अत्यंत दिव्य, प्रेरक और आध्यात्मिक वातावरण में सफलता पूर्वक सम्पन्न हुआ। यह महायज्ञ केवल एक धार्मिक आयोजन नहीं, बल्कि विचार क्रांति और युग निर्माण का प्रभावशाली माध्यम बनकर सामने आया।

अखिल विश्व गायत्री परिवार द्वारा संचालित यह महायज्ञ गाजियाबाद जनपद सहित आसपास के लगभग ५१ गांवों को विशेष रूप से प्रेरित एवं प्रभावित करने वाला ऐतिहासिक कार्यक्रम सिद्ध हुआ। प्रकृति के पावन और खुले वातावरण में सम्पन्न इस महायज्ञ ने श्रद्धालु परिजनों के हृदय में श्रद्धा, भक्ति और सकारात्मक ऊर्जा का संचार किया।

इस यज्ञ के माध्यम से अनेक नए परिजन गायत्री परिवार से जुड़े तथा संस्कार, साधना और सेवा के मार्ग पर चलने की प्रेरणा प्राप्त की। यह महायज्ञ निश्चित रूप से क्षेत्र में गायत्री परिवार के विस्तार और युग निर्माण अभियान को नई गति प्रदान करने वाला सिद्ध होगा।

कन्नौजा, मुरादनगर के समर्पित गायत्री परिजनों द्वारा कई महीनों तक किए गए अथक परिश्रम, निष्ठा और संगठनात्मक प्रयास इस भव्य आयोजन की सफलता का आधार बने। यह आयोजन इस बात का सजीव उदाहरण है कि जब समर्पित कार्यकर्ता मिलकर कार्य करते हैं, तो मिशन के विस्तार के लिए बड़े से बड़े लक्ष्य भी सहज रूप से प्राप्त हो जाते हैं।

यह कार्यक्रम शांतिकुंज हरिद्वार के मार्गदर्शन एवं तत्वावधान में सम्पन्न हुआ, जिसमें शांतिकुंज की टोली का नेतृत्व उत्तरी जोन प्रभारी आदरणीय श्री परमानंद द्विवेदी जी ने किया। उनके प्रेरक मार्गदर्शन और समर्पित सहयोग से सम्पूर्ण आयोजन अत्यंत सुव्यवस्थित, अनुशासित और गरिमामय ढंग से सम्पन्न हुआ।

 

यह ५१ कुण्डीय गायत्री महायज्ञ केवल एक आयोजन नहीं, बल्कि क्षेत्र में आध्यात्मिक जागरण, संस्कार संवर्धन और सामाजिक एकता का सशक्त संदेश बनकर उभरा है।

निश्चित ही यह दिव्य प्रयास आने वाले समय में
👉 व्यक्ति निर्माण
👉 परिवार निर्माण
👉 समाज निर्माण

के मार्ग को और अधिक सशक्त करेगा।

यज्ञ की दिव्य प्रेरणा से क्षेत्र में सद्भाव, संस्कार और सकारात्मक चेतना का विस्तार निरंतर होता रहे — यही कामना है। 🙏🌼

Sunday, January 4, 2026

कोणार्क सूर्य मंदिर : समय की उपासना का शाश्वत संदेश

ओडिशा के पुरी ज़िले में स्थित कोणार्क सूर्य मंदिर केवल पत्थरों से बना एक प्राचीन स्थापत्य नहीं है—यह समय (Time) पर आधारित एक जीवंत दर्शन है। 13वीं शताब्दी में राजा नरसिंहदेव प्रथम द्वारा निर्मित यह मंदिर सूर्य देव के उस महान रथ के रूप में रचा गया है, जो निरंतर आगे बढ़ता है—रुकता नहीं, थमता नहीं।

24 पहिये — 24 घंटे

मंदिर के रथ में बने 24 पत्थर के पहिये केवल अलंकरण नहीं हैं। वे हमें याद दिलाते हैं कि हर दिन के 24 घंटे समान रूप से मूल्यवान हैं।

  • एक पहिया भी यदि जाम हो जाए, तो रथ रुक जाता है।
  • वैसे ही यदि जीवन के कुछ घंटे आलस्य, टालमटोल या दिशाहीनता में चले जाएँ, तो जीवन की गति बिगड़ जाती है।

प्रश्न यह नहीं है कि आपके पास समय कितना है, प्रश्न यह है कि आप हर घंटे का उपयोग कैसे करते हैं।

7 घोड़े — सप्ताह के 7 दिन

रथ को खींचते 7 घोड़े सप्ताह के सात दिन हैं—सोमवार से रविवार तक।

  • कोई दिन छोटा नहीं, कोई दिन बड़ा नहीं।
  • हर दिन की अपनी भूमिका है—कर्म का, सीख का, सेवा का, विश्राम का।

जो व्यक्ति सप्ताह के हर दिन को उद्देश्यपूर्ण बनाता है, वही जीवन की दौड़ में आगे बढ़ता है।

सूर्य की उपासना = समय की उपासना

सूर्य प्रतिदिन उदित होते हैं—बिना रुके, बिना बहाने।

  • वे न किसी का इंतज़ार करते हैं
  • न किसी के लिए देर करते हैं

सूर्य की उपासना का वास्तविक अर्थ है—समय का सम्मान।
जो समय का सम्मान करता है, समय उसे पहचान, स्थिरता और सफलता देता है।

कोणार्क का जीवन-संदेश

कोणार्क हमें मौन में सिखाता है:

  • जीवन ठहरने के लिए नहीं, गति के लिए है
  • अवसर प्रतीक्षा नहीं करते, वे गुजर जाते हैं
  • परिवर्तन प्रकृति का नियम है, और समय उसका वाहक

जो व्यक्ति अतीत के पश्चाताप और भविष्य की चिंता से ऊपर उठकर वर्तमान क्षण में जीना सीख लेता है, वही सच्चा साधक है।

आत्मचिंतन

आज स्वयं से पूछिए:

  • क्या मेरे 24 घंटे जागरूकता में बीत रहे हैं?
  • क्या मेरे सप्ताह के 7 दिन किसी लक्ष्य से जुड़े हैं?
  • क्या मैं सूर्य की तरह नियमित, अनुशासित और निरंतर हूँ?

यदि उत्तर “हाँ” की ओर बढ़ रहा है, तो समझिए—आपने सूर्य की सच्ची उपासना आरंभ कर दी है।


समय ही जीवन है।
समय का सम्मान ही सूर्य की पूजा है।
और सूर्य की पूजा ही जीवन की सफलता का मार्ग है।
🌞

Thursday, October 22, 2015

सुसंस्कृत व्यक्तित्वों की आवश्यकता

 


युग निर्माण के उपयुक्त परिस्थितियाँ वे लोग उत्पन्न करेंगे, जिनमे मूलतः उत्कृष्ट स्तर की शक्ति, क्षमता, प्रतिभा और आस्था विद्यमान हो। यह क्षमता भाषण सुनने या लिखने-पढ़ने से ही उत्पन्न नहीं होती , वरन उसके लिए जन्मजात संस्कारों की भी आवश्यकता रहती है।


क्यों धर्म -अध्यात्म बदनाम है?
 
आज धर्म और अध्यात्म पर भी राजनैतिक विषयों की भाँति ही धुँआधार भाषण होते हैं। कीर्तन, कथा, रामायण, यज्ञ आदि के उत्सव समारोह आए दिन होते रहते हैं, जिनमें धार्मिक विषयों पर विद्वतापूर्ण भाषण होते हैं। रामलीला जगह जगह होती है, उसमे भी भगवान राम के आदर्शों को अपनाने की प्रेरणा देना ही उद्देश्य होता रहता है। गंगा स्नान के मेले , कुम्भ आदि पर्व, चारों धामों, तीर्थ आदि में भी ऐसा ही वातावरण बनता है, जिससे यदि मनुष्य चाहे तो बहुत कुछ प्रेरणा प्राप्त कर सकता है। नाटक, सिनेमाओं में भी कई बार धर्म शिक्षा के दृश्य रहते हैं।



पत्र -पत्रिकाओं में कर्त्तव्यबोधक लेख बहुत छपते रहते हैं। गीता, रामायण जैसी प्रधान धर्म पुस्तकों की प्रतियाँ लाखों की संख्या में हर साल छपती हैं और लोगों द्वारा खरीदी एवं पढ़ी जाती हैं। ऐसा साहित्य और भी जगह-जगह से छापा और फैलाया जाता है। इस प्रकार भाषण और लेखन द्वारा निरंतर यह प्रयत्न किया जा रहा है कि लोग अच्छे बनें। इन बातों को लोग पढ़ते-सुनते न हों सो बात भी नहीं है, पर देखा यह जाता है कि चिकने घड़े की तरह लोग उससे मनोरंजन मात्र कर लेते हैं, उसे जीवन में उतारने के लिए एक कदम भी आगे बढ़ने को तैयार नहीं होते। और तो और,  धर्म और अध्यात्म के प्रवचन कर्ता और लेखक स्वयं भी अपनी कथनी की अपेक्षा करनी से बहुत पिछड़े रहते हैं। कई बार तो उनका आचरण बिलकुल उल्टा देखा जाता है।


 इन तथ्यों पर विचार करते हुए कारण जानने की गहराई में जब उतरा जाता है, तब एक बात स्पष्ट होती है कि व्यक्ति में मूलतः वे तत्त्व भी होने चाहिए जिनमें सद्ज्ञान को ग्रहण करने की शक्ति और आदर्श को जीवन में उतारने की साहस पूर्ण सामर्थ्य भी विद्यमान हो। इसके बिना अच्छी शिक्षा का भी कुछ विशेष लाभ नहीं मिल सकता।

 चरित्रवान व्यक्तित्वों की आवश्यकता
 
धर्म की शिक्षा देने वालों की वक्तृता भले ही नीरस हो, उनका चरित्र सामान्य लोगों की अपेक्षा अधिक पवित्र, अधिक प्यारा और अधिक प्रकाशवान होना चाहिए। आज धर्म शिक्षा देने वाले लेखक-वक्ता तो बहुत हैं , पर उनके पास कबीर, नानक , गुरु गोविंदसिंह , रामदास , बुद्ध , महावीर,  गांधी जैसा व्यक्तित्व नहीं है। वाणी की शक्ति तो स्वल्प है।  प्रभाव वस्तुतः चरित्र का पड़ता है। संस्कारवान सुनने वाले और चरित्रवान कहने वाले जब कभी मिल जाते हैं, तब थोड़ा सा प्रशिक्षण भी जादू का असर उत्पन्न करता है।  इसके बिना अन्य मनोरंजन की तरह धर्म भी दिल -बहलाव का एक विषय बनकर रह जाता है।  धर्म , जीवन में उतरने की वस्तु है, आचरण में लाने  पर ही उसका कोई लाभ और प्रभाव अनुभव किया जा सकता है।


यदि धर्म को व्यवहारिक रूप धारण करते हुए देखना हो तो ऐसे संस्कारवान व्यक्तियों का निर्माण करना होगा, जो धर्म को सुन समझकर ही संतुष्ट न हो जाए , वरन उसे कार्यान्वित करने के लिए साहसपूर्ण कदम उठा सकने की क्षमता भी रखते हों। तेजस्वी व्यक्तित्वों के निर्माण के लिए माता-पिता को तप करना होता है।  प्राचीन काल के इतिहास पुराणों को पढ़ने से स्पष्ट होता है कि महापुरुषों को जन्म देने वाले माता-पिताओं ने दीर्घ काल तक अनेक जन्मों तक तप किए थे। उस तप से शरीर और मन को, रज और वीर्य को ऐसा सुसंस्कारी बनाया था कि उससे तेजस्वी क्षमताओं का प्रजनन संभव हो सके।  उन बालकों का पालन-पोषण करनी होती है तथा शिक्षा-दीक्षा के लिए भी ऐसा प्रबंध करना होता है कि जहाँ केवल साक्षरता ही नहीं, वरन चरित्र तथा व्यक्तित्व का भी विकास  हो सके। सुसंस्कृत तथा श्रेष्ठ व्यक्तित्वों के निर्माण का यही मार्ग है।  अपवाद रूप से कभी-कभी कीचड़ में कमल भी उत्पन्न होते हैं, पर क्रम यही है कि संस्कारवान श्रेष्ठ व्यक्तित्व सदा श्रेष्ठ माता-पिता और श्रेष्ठ पारिवारिक वातावरण में से ही विनिर्मित होते हैं।


अब युग की रचना के लिए ऐसे व्यक्तित्वों की ही आवश्यकता है, जो वाचालता और प्रोपेगेंडा से दूर रहकर अपने जीवन को प्रखर एवं तेजस्वी बनाकर अनुकरणीय आदर्श उपस्थित करें और जिस तरह चन्दन का वृक्ष आसपास के पेड़ों को सुगन्धित कर देता है, उसी प्रकार अपनी उत्कृष्टता से अपना समीपवर्ती वातावरण भी सुरभित कर सकें।  अपने प्रकाश से अनेकों को प्रकाशवान कर सकें।


धर्म को आचरण में लाने के लिए निःसंदेह बड़े साहस और बड़े विवेक की आवश्यकता होती है। कठिनाइयों का मुकाबला करते हुए सदुद्देश्य की ओर धैर्य और निष्ठापूर्वक बढ़ते चलना मनस्वी लोगों का काम है। ओछे और कायर मनुष्य दस-पाँच कदम चलकर ही लड़खड़ा जाते हैं। किसी के द्वारा आवेश या उत्साह उत्पन्न किये जाने पर थोड़े समय श्रेष्ठता के मार्ग पर चलते हैं, पर जैसे ही आलस्य प्रलोभन या कठिनाई का छोटा मोटा अवसर आया कि बालू की भीत की तरह औंधे मुँह गिर पड़ते हैं। आदर्शवाद पर चलने का मनोभाव देखते-देखते अस्त व्यस्त हो जाता है। ऐसे ओछे लोग अपने को न तो विकसित कर सकते हैं और न शांतिपूर्ण सज्जनता की जिंदगी ही जी सकते हैं। फिर इनसे युग निर्माण के उपयुक्त उत्कृष्ट चरित्र उत्पन्न करने की आशा कैसे की जाय ? आदर्श व्यक्तित्वों के बिना दिव्य समाज की भव्य रचना का स्वप्न साकार कैसे होगा? गाल बजाने वाले पर उपदेश कुशल लोगों द्वारा यह कर्म यदि संभव होता, तो वह अब से बहुत पहले ही संपन्न हो चुका होता। जरूरत उन लोगों की है जो आध्यात्मिक आदर्शों की प्राप्ति को जीवन की सबसे बड़ी सफलता अनुभव करें और अपनी आस्था की सचाई प्रमाणित करने के लिए बड़ी से बड़ी परीक्षा का उत्साहपूर्ण स्वागत करें।


आदर्श व्यक्तित्व ही किसी देश या समाज की सच्ची समृद्धि माने जाते हैं। जमीन में गढ़े धन की चौकसी करने वाले सांपों की तरह तिजोरी में जमा नोटों की रखवाली करने वाले कंजूस तो गली कूँचों में भरे पड़े हैं।  ऐसे लोगों से कोई राष्ट्र न तो महान बनता है और न शक्तिशाली। राष्ट्रीय प्रगति के एकमात्र उपकरण प्रतिभाशाली , चरित्रवान व्यक्तित्व ही होते हैं। हमें युग निर्माण के लिए ऐसी ही आत्माएँ चाहिए। इनके अभाव में अन्य सब सुविधा-साधन होते हुए भी अभीष्ट लक्ष्य की प्राप्ति में तनिक भी प्रगति न हो सकेगी। 

इस जरूरत को पूरा करना हम सबकी जिम्मेदारी 
 
गायत्री परिवार का प्रत्येक घर आदर्श व्यक्तित्व ढालने की टकसाल बने, यही प्रयत्न हमें करना होगा। इसके लिए यह नितांत आवश्यक है कि इनमें ऐसा सौम्य वातावरण रहा करे, जिसके सानिध्य में रहने वाले बालक संस्कारवान बनते चले जाएँ और प्राचीन भारत की तरह हर घर में नर रत्नों का उद्यान खिला हुआ दृष्टिगोचर हो सके। जन्मजात संस्कारों के अभाव में स्कूली शिक्षा व्यक्तित्व के निर्माण में बहुत ही कम सहायक हो सकती है।  आज कितने  ही आदर्श विद्यालय , छात्रालय एवं गुरुकुल अच्छी शिक्षा की व्यवस्था रख रहे हैं , पर जन्मजात संस्कारों के अभाव में उनमें पढ़ने वाले बालक भी वैसे नहीं बन पा रहे हैं , जैसी की आशा की जाती थी। इसलिए पत्तों की सफाई को ध्यान रखने से पूर्व हमें जड़ों को सींचना भी नहीं भूलना चाहिए। नई पीढ़ी जन्मजात इन संस्कारों को लेकर जन्म ले, यह युग निर्माण का एक महत्वपूर्ण पहलू है।  इसकी पूर्ति के लिए हमें सुव्यवस्थित योजना बनाकर कार्य करना होगा।  


वर्तमान पीढ़ी जिस रज वीर्य से बनी है , जिस वातावरण में पली है , वह संस्कारवान न होने से हीन मानसिक दशा से बुरी तरह ग्रसित है।  मानवीय स्वाभिमान कर्त्तव्य और दायित्व से वह अपरिचित जैसी ही दिखती है।  विपन्नताओं  का रोना तो रोती है , पर उसे बदलने के लिए जिस साहस , त्याग और बलिदान की आवश्यकता है, उससे दूर-दूर ही बनी रहती है। तृष्णा और वासना में इतना जकड़ रही है , कि मानवोचित पुरुषार्थ के लिए अवकाश , उत्साह बन नहीं पाता।  जिन आदर्शों के लिए हमारे पूर्व पुरुष प्राण तक देने में आनंद मानते थे, उन्हें आज उपहासास्पद एवं बेवकूफ समझा जाता है।  मनुष्य इतना स्वार्थी धूर्त और संकीर्ण बना हुआ है कि धर्म और सदाचर केवल गाल बजाने तक सीमित रह गए हैं , व्यवहार में पशुता एवं पैशाचिकता का ही बोलबाला रहता है। 


 यह परिस्थितियाँ बदलने के लिए, मानव अंतःकरण को बदलने के लिए लोकशिक्षण तो आवश्यक है ही , पर साथ ही यह और भी आवश्यक है कि लोकशिक्षण का आधार व्यक्तिगत जीवन एवं परिवार को आदर्शवादी साँचे में ढाला जाए। अध्यात्म, पूजा-पाठ की, कहने -सुनने की वस्तु न रहे , वरन उसे दैनिक जीवन में , नियमित व्यवहार में उतारने को एक अनिवार्य आवश्यकता माना जाए। ऐसे व्यक्तित्व और परिवार न केवल वर्तमान समाज को परिवर्तित करेंगे, वरन नई पीढ़ी में आदर्शवादी नर -रत्नों को जन्म दे सकने में भी समर्थ होंगे। मनस्वी एवं तपस्वी मनुष्यों का समाज जितना बढ़ता जायेगा, उतना ही इस धरती पर स्वर्ग का अवतरण होगा। उज्ज्वल व्यक्तित्वों से ही भव्य समाज की नव्य रचना संभव होगी। 

(उपर्युक्त आलेख अखंड ज्योति-मार्च १९६४ से उद्धृत है )

Monday, October 19, 2015

औरों के हित जो जीता है

स्वार्थ और अहंकार से मुक्त होकर औरों के लिए जो कष्ट उठाया जाता है , वही सच्चा धर्म है। धर्म है औरों के लिए , राष्ट्र के लिए , विश्व के लिए स्वयं का उत्सर्ग। परहित अर्थात औरों   की ख़ुशी के लिए,  औरों की पीड़ा मिटाने  के लिए स्वयं को उत्सर्ग कर देना ही धर्म है। यह प्रक्रिया अत्यंत कष्टदायी अवश्य है, परन्तु इसी में सुख, शांति एवं संतोष मिलता है। ऐसे में धर्म कष्टों अथवा संकटों से घिरा अवश्य होता है , धर्म के पालन से कठिनाई अवश्य होती है, परन्तु अंततः धर्म की ही जीत होती है और धर्मपालन का परिणाम, अत्यंत श्रेष्ठ एवं संतोषदायक होता है।


औरों को क्लेश देना अधर्म है और परहित हेतु क्लेश सहना धर्म है। समर्थ और शक्तिशाली व्यक्ति दूसरों को कष्ट दे सकता है और कष्ट देने में उसे कोई अतिरिक्त चेष्टा भी नहीं करनी पड़ती। सबल निर्बल को सता सकता है और सताता  भी है। अपनी सामर्थ्य और सम्पदा का उपयोग और उपभोग तो सभी करते हैं । अपने सुख को प्राथमिकता देना सामान्य बात हो सकती है। स्वयं के लिए तो सभी जीते हैं, परन्तु ये सभी मानदंड और मापदंड, ईश्वर के श्रेष्ठ राजकुमार इंसान के लिए सही ठहराए नहीं जा सकते हैं। ऐसी प्रकृति और प्रवृति तो मानवेतर प्राणियों में भी पायी जाती है, फिर मानव और मानवेतर प्राणियों में अंतर क्या है, फरक क्या है ?


यह अंतर धर्म ही है, जो मनुष्य को अन्य योनियों से अलग खड़ा करता है, विशिष्ट और विशेष बनाता है और इसे प्रकृति का सर्वोत्तम एवं श्रेष्ठ प्राणी बनाने में विशिष्ट भूमिका अदा करता है। धर्म उस साहस का नाम है, जो यह प्रतिपादित कर सके कि कैसी भी विपन्न एवं विपरीत परिस्थितियाँ आएँ , कैसा भी कष्ट मिले और किसी भी तरह की कठिनाइयों का क्यों न सामना करना पड़े , हम सही व शाश्वत पथ का सदा अनुसरण करेंगे।


धर्म होगा तो साहस होगा और साहस होगा तो प्रस्तुत चुनौतियों से डटकर मुकाबला होगा , प्राणपण से उनका सामना किया जायेगा। साहस होगा तो इस धर्म से कभी भी कदम वापस नहीं खींचे जा सकेंगे, चाहे इसके लिए कितनी भी और कैसी भी कीमत क्यों न चुकानी पड़े।


जो डरपोक होते हैं , कायर होते हैं , पल-पल घबरा उठते हैं , वे कभी भी धर्म के साथ खड़े नही हो सकते। ऐसे लोगों पर जब भी विपरीत परिस्थितियाँ आती हैं और जरा-सी भी कठिनाइयाँ सिर उठाती हैं  तो ये सिहर उठते हैं, स्वयं को बचाने के लिये ये भागते फिरते हैं। ये धार्मिक नहीं हो सकते, चाहे बाहरी रूपों में कितने भी धर्मावलम्बी क्यों न दिखते हों। धर्म के प्रतीकों को केवल दिखाने के लिये ओढ़कर कोई धार्मिक तो दिख सकता है , परन्तु धार्मिक हो नहीं सकता।


तिलक, गले में कंठी माला, विशेष प्रकार के वस्त्र धारण कर कोई भी धार्मिक होने का ढोंग तो कर सकता है , पर धार्मिक हो नहीं जाता। धर्म तो औरों के लिए स्वयं को मिटा देने का नाम है, धर्म का सच्चा प्रतीक एक दीपक है , जो स्वयं को तिल -तिल जलाकर अंत तक प्रकाश की किरणें बिखेरता है। वह स्वयं जल जाता है, लेकिन इस जलन से उफ तक नहीं करता है, बल्कि मुस्कुराते हुए, ज्योति बिखरते हुए स्वयं को उत्सर्ग कर देता है। धर्म औरों की पीड़ा के निवारण के लिए स्वयं को उत्सर्ग करने का नाम है।


RajaShibi
कष्ट तो जीवन का पर्याय है। जब जीवन है तो कष्ट होगा ही। परन्तु ऐसा कष्ट जो किसी और के लिए सहा जाता है, स्वयं के सभी संसाधनों एवं साधनों को लुटाकर सहर्ष कठिनाइयों को ओढ़ लेना ही सच्चा धर्म है।  महान सम्राट शिबि ने एक दुर्बल एवं निरीह जीव को बचाने के लिए अपने हाथों खडग से अपने जाँघ का मांस काटकर अपार पीड़ा सही। वे चाहते तो स्वयं के बदले अन्य किसी को बलिदान देने को कह सकते थे, परन्तु उन्होंने ऐसा नहीं किया और सहर्ष उस कष्ट को सह गए। उनके द्वारा सही गयी इस पीड़ा ने ही उन्हें सच्चा धार्मिक बता दिया। उन्होंने अपने कर्म से  धर्म को जीवंत कर  दिया।


Dadhichi
ऋषि दधीचि महान तपस्वी थे। तपोनिष्ठ जीवन ही उनका सच्चा जीवन था।  वे आत्मज्ञ थे।  उन्हें न तो किसी का भय था और न किसी की आवश्यकता। पुराणों में कथा आती है कि एक बार ऋषि दधीचि भगवान विष्णु से मिलने पहुँचे तो उनका तेजोवलय इतना विराट एवं प्रभावशाली था कि उसके सम्मुख भगवन विष्णु को भी अपनी दृष्टि नीची करनी पड़ी। ऐसे महान तपस्वी ऋषि दधीचि से बिना अनुमति एवं बिना स्वीकृति के उनकी अस्थियों को कोई कैसे प्राप्त कर सकता था? परन्तु सृष्टि कल्याण हेतु वज्र निर्माण करने के लिए उन्होंने सहर्ष अपनी अस्थियाँ दान दे दीं। उन्होंने धर्म रक्षा के लिए असहनीय और अपार पीड़ा सहर्ष स्वीकार कर ली। धर्म ऋषि दधीचि के इस महान त्याग से ही परिभाषित होता है।


Harishchandra_by_RRV
सत्यवादन के प्रतीक राजा हरिश्चंद्र ने भी तो धर्म की रक्षा हेतु कष्टकारी जीवन को स्वीकार किया था। वे एक पराक्रमी और प्रतापी राजा थे और धर्म रक्षा के अतिरिक्त अन्य कोई ऐसा कारण न था, जो उन्हें उस स्थिति में लाकर खड़ा करता, जिसमें उन्हें अपनी पत्नी बच्चो को बेचना पड़े तथा अपने ही पुत्र के शवदाह के लिए पैसे मॉँगने को विवश होना पड़े। परन्तु धर्म की रक्षा के लिए न केवल उन्होंने अपना समस्त राज्य ब्रम्हर्षि विश्वामित्र के चरणों में निछावर कर दिया, वरन ऐसे कष्टो को भी सहर्ष अंगीकार किया, जिन्हें सहना तो दूर उनकी कल्पना मात्र भी सिहरन पैदा कर देती है। राजा हरिश्चंद्र में भी धर्म नए कलेवर में जी उठा था।


अपने शास्त्रों में एवं इतिहास के पन्नो पर हम जिन व्यक्तित्वों को धर्म की जिवंत परिभाषा के रूप में पढ़ते हैं, उन सबके व्यक्तित्व स्वयं के जीवन को तपा कर एवं दूसरों के कष्टों को मिटाकर तैयार हुए नजर आते हैं। वस्तुस्थिति में यही धर्म की सच्ची परिभाषा भी है। मात्र स्वयं के स्वार्थों की पूर्ति के लिए जीने वाले तो मोड़ मोड़ पर मिल जाते हैं, पर दूसरों के कष्टों को हरने के लिए अपने प्राणों की आहुति लगाने वाले ही सच्चे धार्मिक होते हैं। सच्चे धर्म की अनुभूति व्यक्तिगत स्वार्थ और अहंकार से परे जाकर ही होती है।

(उपर्युक्त आलेख अखंड ज्योति - अक्टूबर २०१५ से लिया गया है।)

Sunday, October 18, 2015

युग सैनिक ब्लॉग - एक परिचय


युग सैनिक - ये ब्लॉग है युग सैनिकों के लिए जो वर्तमान युग की चुनौतियों को स्वीकार कर नए परिवर्तन के लिए तैयार हैं।

यहाँ युग सैनिकों को नियमित रूप से क्रन्तिकारी विचारों  की खुराक मिलता रहेगा निम्नलिखित विषयों  पर :

  • धर्म एवं अध्यात्म के तत्वज्ञान का वैज्ञानिक विश्लेषण 

  • कैसे हम अपने आप को बदल सकते हैं?

  • कैसे हम अपने परिवार के मूल्यों में सुधार कर सकते हैं?

  • नैतिक क्रांति केसे?
  • बौद्धिक क्रांति कैसे?
  • सामाजिक क्रांति कैसे?
  •  हम कैसे युग बदल सकते हैं?

युग ऋषि पंडित श्री राम शर्मा आचार्य के एक शिष्य का यह एक विनम्र प्रयास है कि युग परिवर्तन के विचारधारा को इस ब्लॉग के माध्यम से यथासंभव अधिकाधिक लोगों तक पहुँचाया जाय। आप सभी आत्मीय बंधुओं और बहनों से एक विनम्र निवेदन - अपना बहुमूल्य सुझाव अवश्य दें।

युग सैनिक ब्लॉग के प्रेरणा स्रोत

युग सैनिक ब्लॉग के प्रेरणा स्रोत  हैं :


 Sri Ram Sharma Acharya
युग ऋषि श्री राम शर्मा आचार्य 
  • गायत्री परिवार के संस्थापक
  • युग निर्माण योजना, विचार क्रांति अभियान, प्रज्ञा अभियान के सूत्रधार
  • गायत्री के परम उपासक
  • शांतिकुंज , ब्रम्हवर्चस शोध संस्थान, गायत्री तपोभूमि , अखंड ज्योति संस्थान के संस्थापक
  • अखंड ज्योति , युग निर्माण योजना आदि पत्रिकाओं के संस्थापक एवं संरक्षक
  • करीब ३२०० पुस्तकों के लेखक
  • युग परिवर्तन के सूत्र धार
  • और भी बहुत कुछ जिसे हमारी बुद्धि नहीं समझ सकती।